देव शयनी एकादशी 2026: 17 जुलाई, चातुर्मास आरंभ, पूजा विधि और महत्व
देव शयनी एकादशी 2026: 17 जुलाई 2026 को आषाढी एकादशी - भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं। चातुर्मास शुरू, विवाह मुहूर्त 22 नवंबर (देव उठनी एकादशी) तक वर्जित। अगले दिन 18 जुलाई को राहु-केतु गोचर - 17 जुलाई एक शक्तिशाली कर्म दहलीज।
देव शयनी एकादशी 2026 मुख्य तथ्य
- तिथि: 17 जुलाई 2026
- अन्य नाम: आषाढी एकादशी, विष्णु शयनी एकादशी, पद्मिनी एकादशी
- माह: आषाढ़ शुक्ल एकादशी
- चातुर्मास आरंभ: 17 जुलाई 2026
- चातुर्मास समाप्ति: 22 नवंबर 2026 (देव उठनी एकादशी)
- विवाह निषेध: 17 जुलाई से 22 नवंबर 2026
- राहु-केतु गोचर: 18 जुलाई 2026 (अगले दिन)
- मंत्र: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
देव शयनी एकादशी 2026 कब है?
देव शयनी एकादशी 2026: 17 जुलाई 2026। इसे आषाढी एकादशी, विष्णु शयनी एकादशी और पद्मिनी एकादशी भी कहते हैं। आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष एकादशी (11वीं तिथि)। वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक, क्योंकि इससे चातुर्मास शुरू होता है। महाराष्ट्र में पंढरपुर वारी: करोड़ों भक्त विट्ठल (विष्णु) मंदिर की तीर्थयात्रा करते हैं।
देव शयनी एकादशी 2026 का क्या महत्व है?
देव शयनी एकादशी महत्व: 1. चातुर्मास आरंभ: इस दिन से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेष नाग पर योगनिद्रा में जाते हैं। देव उठनी एकादशी (22 नवंबर 2026) तक विश्राम। 2. विवाह निषेध: 17 जुलाई 2026 से 22 नवंबर 2026 तक सभी हिंदू विवाह मुहूर्त वर्जित। 3. धार्मिक प्रतिबंध: शुभ संस्कार और समारोह न्यूनतम। संन्यासी एक स्थान पर रहते हैं। 4. आध्यात्मिक वृद्धि: विष्णु सहस्रनाम, एकादशी व्रत, विष्णु पुराण पाठ विशेष पुण्यकारी।
देव शयनी एकादशी और चातुर्मास का क्या संबंध है?
देव शयनी एकादशी (17 जुलाई 2026) चातुर्मास का द्वार है। चातुर्मास = चार महीने (चतुर=चार, मास=महीना)। 2026 के चार महीने: आषाढ़, श्रावण (14 जुलाई - 12 अगस्त), भाद्रपद (13 अगस्त - 11 सितंबर), आश्विन (12 सितंबर - 11 अक्टूबर)। कुछ परंपराओं में कार्तिक तक (देव उठनी, 22 नवंबर)। इन महीनों में: नए व्यवसाय, विवाह, उपनयन और अन्य शुभ संस्कार परंपरागत रूप से वर्जित।
देव शयनी एकादशी 2026 की पूजा विधि क्या है?
2026 देव शयनी एकादशी पूजा विधि: 1. व्रत: दशमी (16 जुलाई) शाम से शुरू। एकादशी (17 जुलाई) को दिनभर व्रत। पारण: द्वादशी (18 जुलाई) सूर्योदय के बाद। 2. विष्णु पूजा: प्रातः स्नान, स्वच्छ वस्त्र। तुलसी पत्र (आवश्यक), कमल/सफेद फूल, चंदन, फल, पीली मिठाई। 3. पाठ: विष्णु सहस्रनाम, आषाढी एकादशी कथा। 4. वारी (महाराष्ट्र): पंढरपुर यात्रा। 5. मंत्र: "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय", "ॐ नमः नारायणाय"।
देव शयनी एकादशी 2026 पर क्या नहीं करना चाहिए?
देव शयनी एकादशी 2026 निषेध: न खाएं: चावल (अन्न), दाल, प्याज, लहसुन, मांस, शराब। एकादशी पर अन्न नहीं। न करें: शुभ नए कार्य (विवाह, गृहप्रवेश, व्यवसाय उद्घाटन), बाल-नाखून काटना, निंदा/गपशप, दिन में नींद। करें: विष्णु मंत्र, विष्णु पुराण/भागवत पाठ, मंदिर और ब्राह्मण को दान, घी का दीपक तुलसी के पास, 108 बार तुलसी परिक्रमा।
तुलसी का देव शयनी एकादशी में क्या महत्व है?
तुलसी और देव शयनी एकादशी: तुलसी को वृंदा देवी (विष्णु की प्रिया) का स्वरूप माना जाता है। इस दिन विष्णु शयन को जाते हैं - तुलसी उनके साथ प्रतीकात्मक रूप से रखी जाती है। मुख्य तुलसी अनुष्ठान: तुलसी दल (पत्र) विष्णु को अर्पित करें - सबसे महत्वपूर्ण अर्पण। 108 बार तुलसी परिक्रमा। नई तुलसी लगाएं (एकादशी पर शुभ)। संध्या को तुलसी के पास घी का दीपक। "नमो नमस्ते तुलसी" और "विष्णु प्रिये नमस्तुभ्यम्" मंत्र।
देव शयनी एकादशी 2026 की पारण विधि क्या है?
देव शयनी एकादशी 2026 पारण (व्रत तोड़ना): 18 जुलाई 2026 (द्वादशी) को सूर्योदय के बाद पारण। पारण का सही समय: द्वादशी तिथि में, प्रातःकाल हरि वासर समाप्ति के बाद। पारण विधि: पहले पानी, फिर पंचामृत, फिर तुलसी दल और फल। फिर नमकीन/अनाज भोजन। पारण में न खाएं: वही वस्तुएं जो एकादशी पर वर्जित थीं, कुछ परंपराओं में बैंगन से परहेज। महत्व: बिना पारण के व्रत अधूरा माना जाता है।
देव शयनी एकादशी से सभी 12 राशियों पर क्या प्रभाव?
देव शयनी एकादशी 2026 का राशिवार प्रभाव: इस दिन कर्क में सूर्य, उच्च गुरु। अगले दिन (18 जुलाई) राहु-केतु गोचर। यह निकटता देव शयनी एकादशी 2026 को कर्मात्मक रूप से असाधारण बनाती है। सभी 12 राशियों के लिए: चालू कार्यों को पूरा करें, नए बड़े कार्य न शुरू करें, व्रत और प्रार्थना करें, आगे के चार चातुर्मास महीनों के लिए आध्यात्मिक इरादे निर्धारित करें। विशेष ध्यान: कर्क, मीन, कुंभ, सिंह राशि।
देव उठनी एकादशी 2026 कब है और क्या होता है?
देव उठनी एकादशी 2026 (प्रबोधिनी एकादशी): 22 नवंबर 2026 (कार्तिक शुक्ल एकादशी)। इस दिन भगवान विष्णु चातुर्मास निद्रा से जागते हैं। क्या होता है: तुलसी विवाह (तुलसी पौधे का शालिग्राम/विष्णु से विवाह)। 22-23 नवंबर से शुभ कार्य पुनः शुरू। विवाह मुहूर्त 23 नवंबर से। इसे प्रबोधिनी (जागरण) एकादशी भी कहते हैं। कार्तिक मास (जिसमें यह पड़ती है) विष्णु पूजा के लिए अत्यंत शुभ। कार्तिक पूर्णिमा (लगभग 29-30 नवंबर 2026) भी प्रमुख पर्व।
निर्जला एकादशी और देव शयनी एकादशी में क्या अंतर है?
देव शयनी बनाम निर्जला एकादशी: निर्जला एकादशी (ज्येष्ठ माह, लगभग 3 जून 2026): सबसे कठोर - बिना पानी के व्रत। इस एक व्रत से साल की सभी 24 एकादशियों का पुण्य। देव शयनी एकादशी (17 जुलाई 2026, आषाढ़ माह): ब्रह्मांडीय महत्व में सर्वश्रेष्ठ - विष्णु शयन और चातुर्मास आरंभ। व्रत में फल और पानी (अन्न नहीं, लेकिन निर्जला नहीं)। देव शयनी: सांस्कृतिक रूप से बड़ी (पंढरपुर वारी)। निर्जला: तपस्या में बड़ी। दोनों वैष्णव एकादशियां।